एक लडकी है मेरी
एक लडकी है मेरी जिन्दगी में अलबेली सी लगती है…
ना जाने क्यूं उसके बिन जिन्दगी अधूरी सी लगती है…
वो कुछ नहीं मेरी फिर कैसे वो इतनी पास आयी…
कि जीने के लिए अब वो जरूरी सी लगती है…
क्या रिश्ता था मेरा उससे और क्या से क्या हो गया…
हर वक्त मेरे दिल मे रहती एक पहेली सी लगती है…
वो ना ही मेरी अपनी थी ना ही मेरे पास वो रहती थी…
फिर भी क्यूं वो मेरी सांसों की सहेली सी लगती है…
एहसास बनके कई बार वो मुझमें उतर जाती है…
तूफान में गिरते हुए दरिया में एक कश्ती सी लगती है…
जानता हूं ना ही वो मेरी होगी ना ही कभी उसे पाना है शायद…
वो मेरी ना होकर भी यारों क्यूं वो मेरी ही लगती है…