कान्हा जब मुरली बजाता
कान्हा जब मुरली बजाता है, तो राधा रूठ जाती है
रिश्ता एक से निभाता है, दूसरी छूट जाती है !!
माँ यशोदा साथ है फिर भी देवकी की याद आती है
दो नाव में मांझी हो तो कश्ती डूब जाती है !!
दिल के दरवाज़ों पे जब मोहब्बत दस्तक देती है
सियासत दीवार उठाती है ,बीच में कूद जाती है !!
कभी पूँछो मुझसे क्यों मै उड़ने की कोशिश नहीं करता
आसमान छूना जब चाहा जमीन छूट जाती है !!
मोहब्बत भी यहाँ गुल क्या खूब खिलाती है
जिसके लिये सब कुछ छोड़ा वहीँ हमसे रूठ जाती है !!
मुझ पे इल्जाम लगते है वक़्त के साथ नहीं चलता
एक सिरा मै थामता हूँ डोरी टूट जाती है !!