मैने जब सोचा कि


मैने जब सोचा कि तुम बिन जिना मुश्किल बात नही,

दिन तो मुश्किल से ही गुज़रा, तुम बिन गुज़री रात कहाँ ?

ज़हर समय का वह पी लेगा, कहता है तो कहने दो..

लीडर है वो सच न मानें, अब कोई सुकरात कहाँ ।

मेरी आँखों मे बुंदे थी, जब तितली के पंख नुचे,

जी तो चाहे शहर डुबो दूँ, आँखों में बरसात कहाँ ।

तेरी याद के नाखूनों से, रोज उधेड़े जख़्मों को,

मिलन की मरहम की चाहत है, पर ऐसी कोई रात कहाँ ।


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