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Ek mehfil mein do


Ek mehfil mein do taqdeeron ka karaar kho gaya,
Na chahte huye bhi ishq ko husn ka deedar ho gaya,
Is kadar shama se parwane par vaar ho gaya,
Usi pal shola shabnam par nisar ho gaya.

एक दूजे के हाल


एक दूजे के हाल से हम अंजान तो नहीं…
फिर भी हम एक दूजे को तडपाते बहुत हैं…

देखने वालों को लगतें है हम बिल्कुल बेफिकरे….
पर हकीकत में हम एक दूजे को याद आते बहुत है….

जब जज्बात ए महोब्बत का वक्त होता है तो हम खामोश रहते है…
बाद में वो पल याद कर के हम पछताते बहुत है….

पहले कौन बात करेगा रोज इस कश्मकश में दिन गुजर जाता है…
फिर एक दूजे को याद कर अपनी रातों को जलाते बहुत है….

जानते है जिन्दगी का हर सपना अधूरा है हमारा एक दूजे बिन…
फिर भी बिछडनें की बात हम दोहराते बहुत है….

हर बन्दिश हर फासले से बढकर बस इतना ही कहुगां दोस्तों….
दिल ओ जान से टूट कर हम एक दूजे को चाहते बहुत हैं….

इश्क तेरे फरेब में,


इश्क तेरे फरेब में, ये किस मुकाम तक आ गये,
घुट घुट के जिये, ऐसे की शमशान तक आ गये,
मेरे नेकी के चर्चे रहे, ज़माने में कुछ इस तरह,
कि फ़रिश्ते मुझे ढूढते, मेरे मकान तक आ गये,
मेरा सादगी से रहना ही, मेरा गुनाह हो गया,
कुछ जाहिलो के हाथ, मेरे गिरेबान तक आ गये,
इस हुकूमत के दौर में, अब क्या होगा इंसाफ,
जब इंसाफ की कुर्सियों पे, बे-इम..